Wednesday, 29 June 2022

सकारात्मक स्व-प्रेरणा

मन के नकारात्मक भाव जीवन में वैसे ही विचारों की बाढ़ ला देते हैं व स्व-नेतृत्व की कसौटी को पग-पग पर चुनौती देते रहते हैं। इनके स्थान पर अनवरत रूप से सकारात्मक विचारों का चिंतन, मनन एवं प्रतिस्थापन सकारात्मक मनोभूमि का निर्माण करता है। इस दिशा में छोटी-छोटी सफलताएँ स्व-नेतृत्व के भाव को नष्ट एवं सशक्त करती हैं। व्यक्ति सकारात्मक ऊर्जा का पुंज बनता चला जाता है।
Negative thoughts of the mind bring flood of thoughts in life and keep challenging the test of self-leadership step by step. Constantly thinking, contemplating and substituting positive thoughts in their place creates a positive mood. Small successes in this direction destroy and strengthen the spirit of self-leadership. A person becomes a bundle of positive energy.

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Wednesday, 22 June 2022

शाश्वत सुख-शांति

हमारे लिए शास्त्रों का भी यही आदेश है कि हम मानव तन पाकर जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करें। इसी में मानव जीवन की सार्थकता है, सफलता है और गरिमा है। मनुष्य योनि में भी यदि हम पशु योनि की तरह ही जीवन जीते रहे तो फिर मनुष्य के लिए इससे अधिक ग्लानि की बात क्या हो सकती है। पशु-पक्षी आदि योनियों में रहते हुए भी जीव विषय-भागों में निमग्न रहा, पर उसे उससे में निमग्न रहते हुए भी किसी जीव को कभी शाश्वत सुख-शांति की प्राप्ति नहीं हो सकी है। इंद्रियों से मिलने वाले सुख क्षणिक हैं, क्षणभंगुर हैं, पर आत्मा से निस्सृत आनंद शाश्वत है, पूर्ण है।

This is the order of the scriptures for us that we should attain the ultimate goal of life by attaining human body. In this there is meaning of human life, there is success and there is dignity. Even in human vagina, if we continue to live like an animal vagina, then what can be more shameful for a human being than this. Even though living in animals, birds etc., the soul remained engrossed in objects and parts, but despite being immersed in it, no living being could ever get eternal happiness and peace. The pleasures derived from the senses are momentary, fleeting, but the bliss emanating from the soul is eternal, absolute.

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Tuesday, 14 June 2022

सफलता की राह

सफलता की यह राह कभी भी आसान नहीं होती, बल्कि कष्ट-कठिनाइयों से भरी हुई होती है। जिंदगी में जो भी सफलता के शीर्ष तक पहुचें हैं, उनकी राहें कभी आसान नहीं रहीं, बल्कि कल्पनानीत कठिनाइयों से भरी हुई रहीं। इसलिए जो भी करें, उसे पुरे मन से करें। हममें से अधिकतर लोग आधे मन से प्रयास करते हैं और असफल होने पर निराशा से घिर जाते हैं। जबकि खुशियों को स्थायी बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हम उन सभी के प्रति आभार महसूस करें, जिन्होंने हमें कभी-न-कभी किसी रूप में सहायता प्रदान की है। इसलिए जीवन की आप-धापी में कभी भी आभार व्यक्त करने से, शुक्रगुजार होने से न हिचकें। 

This road to success is never easy, but it is full of hardships and difficulties. Those who have reached the top of success in life, their path has never been easy, but filled with difficulties imaginable. So whatever you do, do it with all your heart. Most of us try half-heartedly and end up with despair when we fail. Whereas to keep happiness lasting it is necessary that we feel gratitude towards all those who have helped us in some way or the other. Therefore, do not hesitate to be thankful, by expressing gratitude at any time in your life.

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Tuesday, 16 March 2021

नारी उत्पीड़न एवं आर्य समाज


विश्वभर में ८ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है जो मानव जीवन में महिलाओं के अस्तित्व, वर्चस्व और गरिमा को रेखांकित ही नहीं करता बल्कि स्वीकारता भी है लेकिन जिस प्रकार महिला दिवस को मनाया जाता है उसे रस्म अदायगी या औपचरिकता की खानापूर्ति से अधिक कुछ भी नहीं माना जा सकता। महिला दिवस पर अन्तर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिका महिलाओं के बारे में बहुत सारी सामग्री प्रस्तुत करती हैं। जिसमें दर्शाया जाता है कि अमुक महिला ने ये पद या स्थान स्थिति प्राप्त की है। पीठ थपथपाने प्रशंसा करने में इतने लग्नशील हो जाते हैं कि इन करोड़ों महिलाओं के बारे में भूल जाते हैं जो आज भी धार्मिक अंधविश्वास, सामाजिक कुरीतियों और आर्थिक मजबुरियों का शिकार होकर अपनी गरिमा को सरेआम लुटता देख कर खून के आंसू पी लेती हैं और किसी को खबर तक नहीं लगती। कुछ शीर्ष महिलाओं को अपवाद मानकर यदि समूचे महिला समाज पर दृष्टिपात करें तो परिणाम नकारात्मक ही सामने आयेगा, इस स्थिति में ये सारे दावे झूठे हो जाते हैं। जिसमें कहा जाता है कि महिलाओं को भी वो ही समानता, न्याय, स्वतन्त्रता प्राप्त है जो पुरुषों को प्राप्त है। इन दावों का विश्लेषण करके यदि महिला दिवस मनाया जाये तो सार्थक रहेगा।

यहां पर हमें समानता, न्याय और स्वतंत्रता के आधार पर ही चर्चा करनी चाहिए। यदि नारी को वास्तव में समानता का दर्जा प्राप्त है तो प्रश्न उठता है कि हर वर्ष लाखों कन्या भ्रूण हत्यायें इस देश में क्यों हो रही हैं? इस्लाम ने एक पुरुष को चार औरतें रखने की छूट क्यों दे रखी है? ईसाईयत आज भी नारी को रूह व आत्मा का प्राणी क्यों मानते हैं?

शरीयत में आज भी महिला की आधी गवाही क्यों माना जाता है? मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, मठों में पुजारी, इमाम, पादरी, महंत के पद पर पुरुषों का वर्चस्व सदियों से क्यों चला आ रहा है? बुरके व परदे महिलायें क्यों पहनती हैं? सती प्रथा का अत्याचार पुरुषों पर क्यों नहीं? पुरुष पर पुनर्विवाह का प्रतिबन्ध क्यों नहीं? आधी आबादी का भाग होते हुए भी महिला पंचायत, विधानसभा, संसद में आधा भाग क्यों नहीं? सरकारी सेवाओं में भी आधा भाग क्यों नहीं? नारी को नरक का द्वार क्यों माना जाता है? उसे ताड़ना का ही पात्र क्यों माना गया? नारी को मर्द की खेती क्यों कहा गया? देवदासी प्रथा, कन्या बाल विवाह, बलात्कार, यौन उत्पीड़न, तलाक पुरुष निरंकुशता, सम्पत्ति में भागीदारी न होना ये सब महिलाओं के खाते में क्यों है? जिस समाज में नारी पुरुष पर आश्रित हो और उसकी पहचान पुरुष गोत्र से हो तो उस समाज में समानता का अर्थ कितना रह जाता है?

कानून की दृष्टि में नर-नारी समान हैं लेकिन न्यायाधीश और अदालत को विधि सहिंताओं के अन्तर्गत ही फैसला लेना होता है और विधि सहिंताओं के निर्माता पुरुष रहे हैं महिलाएं नहीं। इसलिए विधि सहिंताएं महिलाओं के बारे में पूरी तरह खुद प्राकृतिक न्याय पर आधारित नहीं है। पाकिस्तान में महिला कैदियों में से ८० प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं जो अपने ऊपर हुए बलात्कार को सिद्ध न कर पाने के कारण जेल में बंद है। क्योंकि वहां के कानून में ऐसी ही व्यवस्था है। स्वाधीनता भारत में भी महिलाओं को न्याय व सुरक्षा दिलाने के लिए २५-३० बार नये कानून व अधिनियम बनाने पड़े जिससे मालूम होता है कि कानून व्यवस्था में कुछ कमी थी।

अर्थ शास्त्री अमत्र्य सेन की पुस्तक आर्गुमेंटेटिव इंडियन के आधार पर उत्तरजीविता की समानता, घरेलु लाभ या कार्बो में असमान हिस्सा, घरेलू हिंसा या अत्याचार के भेद मानते हुए नारी पर उत्पीड़न हो रहा है। इन्हें आधार मानते हुए आकलन किया जाता है कि कानून को साक्षी आधारित होने की परिस्थिति की बजाय अन्य सम्भावना पर आधारित बनाना होगा। न्यूनताएं और अक्षमताओं के कारण न्यायी प्रणाली द्वारा पूर्ण न्याय नहीं मिल पाता। जब पुलिस, गवाह, वकील और अदालत तक की आंखे धन से चौंधिया जाती हैं तो कानून को वे अपने सुराख़ बंद करने होंगे, जिनमें से अपराधी बच कर निकल भागता है। ऐसी स्थिति आने पर महिला को न्याय मिल सकता है।

परमपरावादी या रूढ़िवादी समाजों में आज भी नारी दूसरे दर्जे की हैसियत प्राप्त है। युगल प्रेमियों के मामले में पंचायते खापें जो आज निर्णय ले रही हैं उससे यह बात निकल कर आ रही है कि लड़कियों को आजादी देने से पथ भ्रष्ट होने की सम्भावना बलवती होती है। टी.वी., अश्लील पुस्तकें जो वातावरण तैयार कर रही हैं उससे सामाजिक मर्यादा, पारिवारिक यश और चारित्रिक गरिमा पर आघात करने वाली कोई भी घटना इस परम्परागत समाज में घुट जाती है तो एक तूफान खड़ा हो जाता है और औरतों के लिए स्वतंत्रता का दायरा सीमित हो जाता है। विशेषकर यदि ऐसी घटना में दोनों एक ही जाति के न होकर अलग-अलग जाति या सम्प्रदाय के हो तो तब स्थिति और अधिक बिगड़ जाती है।

गांव में आज भी यही परम्परा है कि गोत्र या गांव की लड़की पूरे गांव की बेटी मानी जाती है। इस तथ्य को शहर या दफ्तर बैठने वाले अधिकतर लोग नहीं समझ सकते, न पचा सकते हैं। इनकी दृष्टि में बालिग लड़का या लड़की किसी भी जाति, धर्म से सम्बन्धित हो कानून के अनुसार एक दूसरे के साथ विवाह कर सकते हैं। माता-पिता की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है। वे पूरी तरह स्वतन्त्र है, दूसरे पक्ष का कहना है कि यह कानून न तो हमारी सलाह से बनाया गया है और ना ही हमारी परम्पराओं व परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाया गया था। इसलिए हम मानने को बाध्य नहीं हैं। ऐसे मामलों में युगल को आजीवन अपने गांव, माता-पिता से अलग रहना पड़ता है। कई बार अपने जीवन से भी हाथ धोना है। आर्य समाज अन्तरजातीय विवाह का समर्थन करता है आर्य समाज भी पूर्ण रूप से इसे नहीं अपना पाया। भारतीय समाज विभिन्न जातियों, सम्प्रदायों, संस्कृतियों का देश है लेकिन साझे प्रयासों और साझी सोच से जब समग्र समाज के कल्याण की बात चलेगी तो देर-सवेर ऐसा समाधान अवश्य निकल जायेगा जो अधिकांश को मान्य होगा। यदि नई सम्भावनाओं और नई परिस्थितियाँ पैदा की जाये तो ऐसे समाधानों का क्रियान्वयन सहज एवं सरल होगा।

आर्य समाज उस समृद्ध संस्कृति का समर्थक है जिसमें भारतीय नारी की समानता, न्याय, स्वतंत्रता के अधिकार प्राप्त थे। जिसे आधुनिक नारी प्राप्त करना चाहती है। यह तभी सम्भव है जब समाज में वेदों की आचार सहिंता का भी पालन होगा। जिस वातावरण में ये अधिकार उपयोगी होंगे, वह वातावरण तैयार नहीं हो रहा। नारी की शिक्षा, संस्कार, चरित्र और रोजगार की जब तक समुचित गारण्टी नहीं मिलती तब तक इन अधिकारों की संदिग्धता और दुरूपयोग की सम्भावना बनी रहेगी। - आजाद सिंह बांगड़ 

In terms of law, men and women are equal, but the judge and the court have to take decisions only under the laws and the creators of the law are men and not women. Therefore, the code of law is not entirely based on natural justice for women. In Pakistan, 40 percent of the women prisoners are women who are in jail for not being able to prove their rape. Because there is such a system in the law. In independent India also, for providing justice and protection to women, new laws and regulations had to be enacted 25-30 times, which shows that there was some deficiency in law and order.
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Friday, 10 January 2020

सुख के लिए


मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र हैं, फल भोगने में परतन्त्र है। गीता में कहा गया है- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' अर्थात् तेरा कर्म करने में अधिकार है, फल पाने में नहीं। ईश्वर न्यायकारी है, जो जैसा कर्म करता है उसको अपनी न्यायव्यवस्था से वैसा ही फल देता है। ईश्वर हमें हर पल, हर घड़ी देख, सुन और जान रहा है। मनुष्य के शरीर, वाणी तथा मन से दो प्रकार के कर्म किये जाते हैं। एक-अशुभ, दूसरा-शुभ। शरीर से किए जाने वाले कर्मों को ईश्वर देख रहा होता है, वाणी से किये जाने वाले कर्मों को सुन रहा है तथा मन से किये जाने वाले कर्मों को हर समय किये जाने वाले कर्मों को समय जान रहा होता है। 
शरीर से किये जाने वाले शुभ कर्म-दान, रक्षा, सेवा तथा अशुभ कर्म-चोरी, हिंसा, जारी। वाणी से किये जाने वाले शुभ कर्म-सत्य, प्रिय, हितकारक, स्वाध्याय तथा अशुभ-झूट, कठोर, चुगली करना, व्यर्थ वार्तालाप और मन से किये जाने वाले शुभ कर्म-दया, अस्पृहा (लोभ का त्याग), श्रद्धा तथा अशुभ-परद्रोह, लोभ, नास्तिक्य।
इस प्रकर शरीर से तीन, वाणी से चार तथा मन से तीन, ये दस शुभ व् दस अशुभ कर्म हुये। शुभ कर्मों का फल सुख रूप में मिलता है तथा अशुभ कर्मों का फल दुःख के रूप में मिलता है। एक कवि ने कितना अच्छा कहा है-
शुभ-अशुभ कर्म का फल, निश्चय ही मिलना है कल,
नहीं होगी फेरबदल, प्रभु इंसाफ करेंगे, नहीं माफ करेंगे। 

जब हम ईश्वर को न्यायकारी मानते हैं और जानते है कि वह कर्मों का फल अवश्य देगा। अतः हमें शरीर, वाणी तथा मन से शुभ-शुभ कर्म ही करना चाहिए, अशुभ नहीं। अब थोड़ा और आगे बढ़ते हैं तो ये कर्म भी दो प्रकार के होते हैं। एक-सकाम कर्म, दूसरा-निष्काम कर्म। जो मनुष्य फल की इच्छा रखकर सांसारिक सुख चाहता है, वह सकाम कर्म करता है और जो मानव मात्र के अन्तिम लक्ष्य की इच्छा रखता है अर्थात् कर्तव्य की भावना से प्रेरित होकर और फल की इच्छा का परित्याग करके कर्म करता है तो वह निष्काम कर्म कहलाता है। मनुष्य का अन्तिम लक्ष्य केवल मोक्ष अर्थात् सब दुःखों से छूटना है। वह तभी हो सकता है जब केवल शुभ व निष्काम कर्म ही किये जायें। अतः हमें सदैव शुभ व निष्काम कर्म ही करने चाहिए।

In this way, three from the body, four from speech and three from the mind, these ten auspicious and ten inauspicious deeds happened. Auspicious deeds result in happiness and inauspicious deeds result in grief.

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Monday, 6 January 2020

सर्वनाश की जड़ शराब

कर दे शराब खाना खराब चेहरा बेआब जैसे मुर्दा लाश हो। शराब मनुष्य को चोर, जार, जुवारी, मांसाहारी, कामी, क्रोधी, कुकर्मी, कायर, क्रूर, निर्लज्ज बना सर्वनाश के रास्ते पर ले जाकर छोड़ देती है। फिर ऐसा कौन सा पाप है जो शराबी नहीं करता, यह पापिन शराब मनुष्य के लोक परलोक को बिगड़कर मिट्टी में मिला देती है। नशे तो सारे ही मनुष्य के जीवन को बर्बाद कर देते हैं। आज का नौजवान नाना प्रकार के नशों में ग्रस्त हो रह है। वह माता पिता की सुनता ही नहीं। यह अपने लफंगे यार दोस्तों में बैठकर बीड़ी, सिगरेट, सुलफा, गांजा, स्मैक, सिगार, तम्बाखू, गुटका, नाना प्रकार की नशीली गोलियां खाता-पीता रहता है। न पढता है और नहीं कोई काम करता है। सारा दिन आवारागर्दी करता रहता है और वह मूर्ख उसी को सुख का साधन मनाता है। 

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सामाजिक प्राणी

संस्कार हमारे आचरण की पहचान होते हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और जीवन पर्यंत समाज से जुड़ा रहता है, क्योंकि अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्...