यहां पर हमें समानता, न्याय और स्वतंत्रता के आधार पर ही चर्चा करनी चाहिए। यदि नारी को वास्तव में समानता का दर्जा प्राप्त है तो प्रश्न उठता है कि हर वर्ष लाखों कन्या भ्रूण हत्यायें इस देश में क्यों हो रही हैं? इस्लाम ने एक पुरुष को चार औरतें रखने की छूट क्यों दे रखी है? ईसाईयत आज भी नारी को रूह व आत्मा का प्राणी क्यों मानते हैं?
शरीयत में आज भी महिला की आधी गवाही क्यों माना जाता है? मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, मठों में पुजारी, इमाम, पादरी, महंत के पद पर पुरुषों का वर्चस्व सदियों से क्यों चला आ रहा है? बुरके व परदे महिलायें क्यों पहनती हैं? सती प्रथा का अत्याचार पुरुषों पर क्यों नहीं? पुरुष पर पुनर्विवाह का प्रतिबन्ध क्यों नहीं? आधी आबादी का भाग होते हुए भी महिला पंचायत, विधानसभा, संसद में आधा भाग क्यों नहीं? सरकारी सेवाओं में भी आधा भाग क्यों नहीं? नारी को नरक का द्वार क्यों माना जाता है? उसे ताड़ना का ही पात्र क्यों माना गया? नारी को मर्द की खेती क्यों कहा गया? देवदासी प्रथा, कन्या बाल विवाह, बलात्कार, यौन उत्पीड़न, तलाक पुरुष निरंकुशता, सम्पत्ति में भागीदारी न होना ये सब महिलाओं के खाते में क्यों है? जिस समाज में नारी पुरुष पर आश्रित हो और उसकी पहचान पुरुष गोत्र से हो तो उस समाज में समानता का अर्थ कितना रह जाता है?
कानून की दृष्टि में नर-नारी समान हैं लेकिन न्यायाधीश और अदालत को विधि सहिंताओं के अन्तर्गत ही फैसला लेना होता है और विधि सहिंताओं के निर्माता पुरुष रहे हैं महिलाएं नहीं। इसलिए विधि सहिंताएं महिलाओं के बारे में पूरी तरह खुद प्राकृतिक न्याय पर आधारित नहीं है। पाकिस्तान में महिला कैदियों में से ८० प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं जो अपने ऊपर हुए बलात्कार को सिद्ध न कर पाने के कारण जेल में बंद है। क्योंकि वहां के कानून में ऐसी ही व्यवस्था है। स्वाधीनता भारत में भी महिलाओं को न्याय व सुरक्षा दिलाने के लिए २५-३० बार नये कानून व अधिनियम बनाने पड़े जिससे मालूम होता है कि कानून व्यवस्था में कुछ कमी थी।
अर्थ शास्त्री अमत्र्य सेन की पुस्तक आर्गुमेंटेटिव इंडियन के आधार पर उत्तरजीविता की समानता, घरेलु लाभ या कार्बो में असमान हिस्सा, घरेलू हिंसा या अत्याचार के भेद मानते हुए नारी पर उत्पीड़न हो रहा है। इन्हें आधार मानते हुए आकलन किया जाता है कि कानून को साक्षी आधारित होने की परिस्थिति की बजाय अन्य सम्भावना पर आधारित बनाना होगा। न्यूनताएं और अक्षमताओं के कारण न्यायी प्रणाली द्वारा पूर्ण न्याय नहीं मिल पाता। जब पुलिस, गवाह, वकील और अदालत तक की आंखे धन से चौंधिया जाती हैं तो कानून को वे अपने सुराख़ बंद करने होंगे, जिनमें से अपराधी बच कर निकल भागता है। ऐसी स्थिति आने पर महिला को न्याय मिल सकता है।
परमपरावादी या रूढ़िवादी समाजों में आज भी नारी दूसरे दर्जे की हैसियत प्राप्त है। युगल प्रेमियों के मामले में पंचायते खापें जो आज निर्णय ले रही हैं उससे यह बात निकल कर आ रही है कि लड़कियों को आजादी देने से पथ भ्रष्ट होने की सम्भावना बलवती होती है। टी.वी., अश्लील पुस्तकें जो वातावरण तैयार कर रही हैं उससे सामाजिक मर्यादा, पारिवारिक यश और चारित्रिक गरिमा पर आघात करने वाली कोई भी घटना इस परम्परागत समाज में घुट जाती है तो एक तूफान खड़ा हो जाता है और औरतों के लिए स्वतंत्रता का दायरा सीमित हो जाता है। विशेषकर यदि ऐसी घटना में दोनों एक ही जाति के न होकर अलग-अलग जाति या सम्प्रदाय के हो तो तब स्थिति और अधिक बिगड़ जाती है।
गांव में आज भी यही परम्परा है कि गोत्र या गांव की लड़की पूरे गांव की बेटी मानी जाती है। इस तथ्य को शहर या दफ्तर बैठने वाले अधिकतर लोग नहीं समझ सकते, न पचा सकते हैं। इनकी दृष्टि में बालिग लड़का या लड़की किसी भी जाति, धर्म से सम्बन्धित हो कानून के अनुसार एक दूसरे के साथ विवाह कर सकते हैं। माता-पिता की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है। वे पूरी तरह स्वतन्त्र है, दूसरे पक्ष का कहना है कि यह कानून न तो हमारी सलाह से बनाया गया है और ना ही हमारी परम्पराओं व परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाया गया था। इसलिए हम मानने को बाध्य नहीं हैं। ऐसे मामलों में युगल को आजीवन अपने गांव, माता-पिता से अलग रहना पड़ता है। कई बार अपने जीवन से भी हाथ धोना है। आर्य समाज अन्तरजातीय विवाह का समर्थन करता है आर्य समाज भी पूर्ण रूप से इसे नहीं अपना पाया। भारतीय समाज विभिन्न जातियों, सम्प्रदायों, संस्कृतियों का देश है लेकिन साझे प्रयासों और साझी सोच से जब समग्र समाज के कल्याण की बात चलेगी तो देर-सवेर ऐसा समाधान अवश्य निकल जायेगा जो अधिकांश को मान्य होगा। यदि नई सम्भावनाओं और नई परिस्थितियाँ पैदा की जाये तो ऐसे समाधानों का क्रियान्वयन सहज एवं सरल होगा।
आर्य समाज उस समृद्ध संस्कृति का समर्थक है जिसमें भारतीय नारी की समानता, न्याय, स्वतंत्रता के अधिकार प्राप्त थे। जिसे आधुनिक नारी प्राप्त करना चाहती है। यह तभी सम्भव है जब समाज में वेदों की आचार सहिंता का भी पालन होगा। जिस वातावरण में ये अधिकार उपयोगी होंगे, वह वातावरण तैयार नहीं हो रहा। नारी की शिक्षा, संस्कार, चरित्र और रोजगार की जब तक समुचित गारण्टी नहीं मिलती तब तक इन अधिकारों की संदिग्धता और दुरूपयोग की सम्भावना बनी रहेगी। - आजाद सिंह बांगड़
In terms of law, men and women are equal, but the judge and the court have to take decisions only under the laws and the creators of the law are men and not women. Therefore, the code of law is not entirely based on natural justice for women. In Pakistan, 40 percent of the women prisoners are women who are in jail for not being able to prove their rape. Because there is such a system in the law. In independent India also, for providing justice and protection to women, new laws and regulations had to be enacted 25-30 times, which shows that there was some deficiency in law and order.
आर्य समाज अंतरजातीय विवाह सेवा - राष्ट्रीय एकता के लिए जाति भेद को समाप्त करके सामाजिक समरसता स्थापित करने के उद्देश्य से अंतरजातीय विवाह करने के इच्छुक युवक-युवतियां कानून मान्य आर्य समाज वैदिक विधि से विवाह हेतु संपर्क करें। Contact for Intercaste Marriage at your place. अधिक जानकारी के लिए विजिट करें - https://www.allindiaaryasamaj.com/
Contact for more info. -
Divyayug Monthly Magazine
Arya Samaj Mandir Annapurna Indore,
Bank Colony, Near Bank of India
Opp. Dussehra Maidan,
Annapurna Road, Indore (MP)
Tel.: 0731-2489383, 9300441615
www.divyayug.com
----------------------------------------------------------
दिव्ययुग मासिक पत्र
आर्य समाज मन्दिर अन्नपूर्णा इन्दौर
बैंक कॉलोनी, दशहरा मैदान के सामने
बैंक ऑफ़ इण्डिया के पास, नरेन्द्र तिवारी मार्ग
अन्नपूर्णा, इन्दौर (मध्य प्रदेश) 452009
दूरभाष : 0731-2489383, 9300441615
www.divyayug.com